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ग॒व्यन्त॒ इन्द्रं॑ स॒ख्याय॒ विप्रा॑ अश्वा॒यन्तो॒ वृष॑णं वा॒जय॑न्तः। ज॒नी॒यन्तो॑ जनि॒दामक्षि॑तोति॒मा च्या॑वयामोऽव॒ते न कोश॑म् ॥१६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

gavyanta indraṁ sakhyāya viprā aśvāyanto vṛṣaṇaṁ vājayantaḥ | janīyanto janidām akṣitotim ā cyāvayāmo vate na kośam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ग॒व्यन्तः॑। इन्द्र॑म्। स॒ख्याय॑। विप्राः॑। अ॒श्व॒ऽयन्तः॑। वृष॑णम्। वा॒जय॑न्तः। ज॒नि॒ऽयन्तः॑। ज॒नि॒ऽदाम्। अक्षि॑तऽऊतिम्। आ। च्य॒व॒या॒मः॒। अ॒व॒ते। न। कोश॑म् ॥१६॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:17» मन्त्र:16 | अष्टक:3» अध्याय:5» वर्ग:24» मन्त्र:1 | मण्डल:4» अनुवाक:2» मन्त्र:16


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब प्रजाजनों को कैसे सुख और ऐश्वर्य हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे (गव्यन्तः) अपनी गौओं की इच्छा (अश्वायन्तः) अपने घोड़ों की इच्छा (वाजयन्तः) विज्ञान वा अन्न की इच्छा (जनीयन्तः) तथा स्त्री की इच्छा करते हुए (विप्राः) बुद्धिमान् हम लोग (सख्याय) मित्र होने के वा मित्रकर्म के लिये (वृषणम्) सुख के वर्षानेवाले पिता (जनिदाम्) जन्म देनेवाली माता (अक्षितोतिम्) वा जिसकी रक्षा क्षीण नहीं होती, उस नित्यरक्षक पुरुष को और (अवते) कूप में (कोशम्) मेघ के (न) सदृश (इन्द्रम्) वा सूर्य्य के सदृश प्रकाशमान राजा को (आ, च्यावयामः) प्राप्त करावें, वैसे इस सब को आप लोग भी औरों को प्राप्त कराओ ॥१६॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जिनको सुख और ऐश्वर्य्य की इच्छा होवे, वे मेघ के सदृश धन वर्षाने और नित्य रक्षा करनेवाले राजा को मित्रभाव के लिये ग्रहण करें ॥१६॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ प्रजाभ्यः कथं सुखमैश्वर्यं चाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यथा गव्यन्तोऽश्वायन्तो वाजयन्तो जनीयन्तो विप्रा वयं सख्याय वृषणं जनिदामक्षितोतिमवते कोशं नेन्द्रमाच्यावयामस्तथैतं यूयमप्येनमन्यान् प्रापयत ॥१६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (गव्यन्तः) आत्मनो गा इच्छन्तः (इन्द्रम्) सूर्य्य इव प्रकाशमानं राजानम् (सख्याय) मित्रस्य भावाय कर्मणे वा (विप्राः) मेधाविनः (अश्वायन्तः) आत्मनोऽश्वानिच्छन्तः (वृषणम्) सुखवर्षकम् (वाजयन्तः) विज्ञानमन्नं वेच्छन्तः (जनीयन्तः) जायामिच्छन्तः (जनिदाम्) या जनिं जन्म ददाति (अक्षितोतिम्) अक्षीणा ऊती रक्षा यस्य तम् (आ) (च्यावयामः) प्रापयामः (अवते) कूपे। अवत इति कूपनामसु पठितम्। (निघं०३.२३) (न) इव (कोशम्) मेघम् ॥१६॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। येषां सुखैश्वर्येच्छा स्यात्ते मेघ इव धनवर्षकं नित्यरक्षं राजानं मित्रत्वाय सङ्गृह्णीयुः ॥१६॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. ज्यांना सुख व ऐश्वर्याची इच्छा असेल त्यांनी मेघाप्रमाणे धनाचा वर्षाव करणाऱ्या व नित्य रक्षण करणाऱ्या राजाचा मित्राप्रमाणे स्वीकार करावा. ॥ १६ ॥